*एक धर्म चर्चा* 🛕
*आर्य-* जो साकार होता है वह व्यापक नहीं हो सकता।
जब व्यापक न होगा तो सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता।
जैसे व्यक्ति अपने घर में बैठा है तो वह अपने कार्यालय में नहीं है।
कार्यालय में है तो उसे घर में क्या हो रहा है पता नहीं होता क्योंकि वह एकदेशी है पर परमात्मा सर्वव्यापक होने से जब जगह की जानता है जैसे हवा सब जगह व्यापक होती है।
*नरेन्द्र भारद्वाज*- ईश्वर निराकार है पर वह साकार भी हो सकता है ऋगवेद में लिखा है
तीन चीज अनादि हैं
1.ईश्वर 2 .जीव ;और 3 . प्रकृति
ईश्वर जब सब शरीरों को बनाता है तो क्या अपना शरीर नहीं बना सकता है। वह अपना शरीर बना सकता है ।आत्मा भी सूक्ष्म है परमात्मा सूक्ष्म है ।
स्थूल ये हो नहीं सकते तो अब शरीर किस से बनाएं
जीव प्रकृति से बना शरीर धारण करता है ऐसे ही परमात्मा भी प्रकृति से बना शरीर धारण करता है।
जैसे कोई कार खराब बनी है
तो एक कंपनी उस से भी बढ़िया कार बना देती है ।ऐसे ही परमात्मा जीव से भी उत्तम अपना शरीर बनाता है इस लिए गीता में भगवान ने कहा है मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं।
*आर्य-* क्या अनंत आकाश को एक मुट्ठी में बंद कर सकते हो या वह परमात्मा गर्भ में आकर एकदेशी हो जाता है।
*नरेन्द्र भारद्वाज-* जीव तो शरीर में पूरा आ जाता है शरीर से बाहर नहीं होता पर परमात्मा शरीर में भी रहेगा और शरीर से बाहर भी रहेगा।
अपने शरीर को कठपुतली की तरह प्रयोग करेगा उसकी सर्व्यापकता पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
गीता में लिखा है
वह अजन्मा परमात्मा प्रकृति को काबू में कर शरीर धारण करता है।
*आर्य*- प्रकृति तो नाशवान है।
*नरेन्द्र भारद्वाज*- प्रकृति रूप बदलती रहती है पर नष्ट नहीं होती ।
आत्मा और परमात्मा दोनों सूक्षम है स्थूल हो ही नहीं सकते
उनको प्रकृति का शरीर धारण करना पड़ेगा।
आत्मा शरीर में रहेगी और परमात्मा शरीर में भी रहेगा और अपने शरीर से बाहर भी रहेगा क्योंकि वह सर्वव्यापक है जीव एकदेशी है।
*आर्य*- कोई शास्त्र का प्रमाण भी देने का कष्ट करें।
*नरेन्द्र भारद्वाज*- यजुर्वेद 31/19 में भी कहा गया है कि ईश्वर साकार होता है ।
प्र॒जाप॑तिश्च॒रति॒ गर्भे॑ऽअ॒न्तरजा॑यमानो बहु॒धा वि जा॑यते। तस्य॒ योनिं॒ परि॑ पश्यन्ति॒ धीरा॒स्तस्मि॑न् ह तस्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥१९ ॥
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